Tuesday, May 21, 2019 04:49 PM

निर्दोष-निहत्थों का नरसंहार

प्रथम महायुद्ध में अंग्रेजी हकूमत के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने भी हिस्सा लिया था। महायुद्ध में 1 लाख के करीब भारतीय मारे गए थे और भारत ने एक हजार करोड़ रुपए का खर्च भी उठाया था। महायुद्ध की समाप्ति के बाद भारतीयों को आशा थी कि अंग्रेजी हकूमत अपने किए वायदों के अनुसार भारतीयों को आजादी की राह पर और राहत प्रदान करेगी। लेकिन भारतीयों की सारी आशाओं पर पानी फेरते हुए अंग्रेजी हकूमत ने फरवरी 1919 में रॉलट बिल लाया। इस एक्ट के तहत भारतीयों की रही सही नागरिक स्वाधीनता भी समाप्त कर दी गई। 

अंग्रेजी हकूमत द्वारा लाए रॉलट बिल के विरुद्ध गांधी ने 1 मार्च को घोषणा की कि यदि रॉलट बिल को एक्ट बनाकर लागू किया जाता है तो सत्याग्रह शुरू होगा। अंग्रेजी हकूमत ने 18 मार्च को रॉलट एक्ट बना दिया तब गांधी ने एक प्रतिज्ञा पत्र छपवा जिस पर हस्ताक्षर करने वाले को यह प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी। ''चूंकि मैं इन बिलों का विरोधी हूं और उनको अन्यायपूर्ण, वैयक्तिक स्वतन्त्रता का घातक तथा मौलिक अधिकारों पर कुठाराघात करने  वाला समझता हूं, इसलिए यदि ये बिल कानून बन गए, तो मैं इस कानून का तब तक उल्लंघन करूंगा, जब तक कि रद्द न कर दिए जाए। साथ ही मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं सत्य तथा अहिंसा का पालन करूंगा।''

6 अप्रैल को सारे देश में हड़ताल हुई। 10 अप्रैल को अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन था लेकिन ओ डायर इस अधिवेशन के विरुद्ध था। 10 अप्रैल को सवेरे अमृतसर कांग्रेस के संगठनकत्र्ता डाक्टर किचलू और डॉ. सत्यपाल अमृतसर जिला मैजिस्ट्रेट के बंगले पर बुलाए गए, और वहीं से वे न मालूम कहां भेज दिए गए। यह खबर बात ही बात में फैल गई, और बड़ी भीड़ अपने आप इकट्ठी होकर यह पूछने के लिए मैजिस्ट्रेट की ओर बढ़ी कि 'वे कहां है?' पर भीड़ को बंगले की तरफ जाने नहीं दिया गया। जनता ने लौटते समय नेशनल बैंक में आग लगा दी  और उसके गोरे मैनेजर को मार डाला। कुल पांच अंग्रेज जान से मारे गए। डा. सत्यपाल तथा स्वामी श्रद्धानन्द के निमंत्रण पर गांधी जी 8 अप्रैल को दिल्ली रवाना हो चुके थे। पर रास्ते में उनको यह हुक्म दिया गया कि आप पंजाब में प्रवेश न करें। गांधी ने इस आदेश को मानने से इनकार किया और वह पलवल स्टेशन से स्पेशल ट्रेन द्वारा 10 अप्रैल को बम्बई वापस कर दिए गए। डा. सत्यपाल और किचलू की गिरफ्तारी पर वहां आम हड़़ताल हुई। 11 अप्रैल को शहर की परिस्थिति ऐसी खराब हो गई कि फौज बुला ली गई। 12 को सभाओं पर रोक लगाई गई, पर किसी को पता न लगा। 13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी वाले दिन जलियांवाला बाग में सभा हुई। जलियांवाला बाग चारों तरफ से घिरा हुआ था। एक तरफ पतला-सा रास्ता था जिसमें होकर एक गाड़ी नहीं जा सकती। जिस समय यह स्थान भीड़ से खचाखच भर रहा था, और व्याख्यान हो रहा था, जनरल डायर सेना की एक टुकड़ी के साथ यहां आए और लोगों पर बिना किसी चेतावनी के गोलियां चलाना शुरू कर दिया। जब जनता भागती भी तो कैसे भागती! सेना उसी पतले प्रवेश पथ को लक्ष्य करके गोली चला रही थी। सरकारी हिसाब से भी 379 आदमी मारे गए, पर वास्तव में लगभग 1000 आदमी मारे गए थे। कई हजार जख्मी होकर रात भर वहीं पड़े रहे। उन्हें किसी प्रकार न तो मदद दी गई, न देने दी गई। जनरल डायर की नादिरशाही यहीं पर खत्म नहीं हुई। वह तो विद्रोही पंजाबियों को एक सबक सिखाना चाहते थे। उन्होंने शहर की बिजली और पानी काट दिया। राहगीरों को पकड़कर रास्ते पर छाती के बल चलने को मजबूर किया गया। दो आदमियों से अधिक के लिए एक साथ चलने की मनाही कर दी गई। लोगों को बिना किसी अपराध के खुली सड़क पर बेंत लगाए गए, रेल में तीसरे दर्जे का टिकट बंद कर दिया गया। साइकिलें छीन ली गईं। शहर में जगह-जगह बेंत लगाने की टिकटी लगा दी गई। फौजी अदालतों में लोगों को मनमानी सजा दी गईं। 51 आदमियों को तो फांसी दे दी गई। सर माइकल ओ डायर को जब जनरल डायर के इन अत्याचारों की बात मालूम हुई, तो डायर ने उसके काले कारनामों का समर्थन करते हुए एक तार भेज दिया। कवीन्द्र रवीन्द्र ने नरसंहार का विरोध करते हुए अपनी सर उपाधि त्याग दी। ऐसा करते हुए उन्होंने एक पत्र लिखा जो शांतिनिकेतन के रवीन्द्र सदन में सुरक्षित है। पत्र यों है- ''पंजाब सरकार ने कुछ स्थानीय उपद्रवों को शांत करने के लिए जिन भयंकर उपायों का अवलम्बन किया, उससे हमारे मानस नेत्रों के सम्मुख निष्ठुर धक्के के साथ भारत में ब्रिटिश प्रजा के रूप में हमारी असहाय स्थिति स्पष्ट हो गई। अभागे लोगों पर जिस प्रकार से बिना किसी अनुपात सजा बोली गई और उसे जिन तरीकों से कार्यान्वित किया गया, उसे देखकर हम इस निश्चित मत पर पहुंच चुके हैं कि सभ्य सरकारों के इतिहास में उसकी कोई तुलना नहीं है, अवश्य ही प्राचीन तथा आधुनिक काल में उसके कुछ अपवाद पाए जाते हैं। यह दुव्र्यवहार ऐसे लोगों पर किया गया है, जो नर-हत्या के अत्यंत भयंकर कुशल संगठन वाली एक शक्ति के द्वारा अशक्त और साधन हीन बना दिए गए हैं, इस बात को ध्यान में रखते हुए हमें बहुत जोर के साथ यह बता देना चाहिए कि इसके लिए किसी प्रकार का राजनीतिक मसलहत का बहाना नहीं किया जा सकता, नैतिक समर्थन की बात तो दूर रही। पंजाब में हमारे भाइयों का जिस तरह अपमान हुआ है, और उन पर जो कष्ट पड़े हैं, उनकी कुछ-कुछ कथा कंठरुद्ध नीरवता के जरिए भारत के कोने-कोने में पहुंच चुकी है और हमारे देश के लोगों के हृदय में इसके फलस्वरूप क्रोध की जो सार्वदेशिक ज्वाला भड़की है, हमारे शासकों ने उसकी अवज्ञा की है। संभव है, वे अपने को बधाई दे रहे हों क्योंकि वे समझते होंगे कि इस तरह उन्होंने बड़ा हितकर सबक दिया है। अधिकांश एंग्लो-इंडियन अखबारों ने इस हृदयहीनता की प्रशंसा की है, और इनमें से कुछ तो उस पाशविक हद तक चले गए हैं कि उन्होंने हमारी यंत्रणाओं की हंसी उड़ाई है और इसमें गंभीर अधिकारीवर्ग की ओर से किसी प्रकार से बाधा नहीं पहुंचाई गई क्योंकि वह भी कष्ट पाने वाले लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे मुखपत्रों पर बराबर निर्दयता के साथ व्यवहार करते रहे हैं और कष्ट की किसी भी अभिव्यक्ति का विरोध करते रहे हैं। यह जानकर दु:ख होता है कि हमारी अपीलों का कोई नतीजा नहीं हुआ और हमारी सरकार में राजनीतिज्ञता के पवित्र मिशन पर प्रतिशोध का अंधा पर्दा पड़ा हुआ है। यदि यह सरकार चाहती है तो उसमें जितनी पशुशक्ति और नैतिक परम्परा है, वह उसी अनुपात से महान हो सकती थी। इस स्थिति में मैं अपने देश के लिए जो सबसे कम कुछ कर सकता हूं, वह यह है कि हम अपने करोड़ों देशवासियों के विरोध को स्वर दें, जो इस समय आतंक की यंत्रणा से अभिभूत होकर चुप्पी साधे हुए हैं। अब वह समय आ गया है, जब अपमान को देखते हुए सम्मान के तमगे हमारी लज्जा को और भी गहरी बना देते हैं और जहां तक मेरा संबंध है, मैं यह चाहता हूं कि सब तरह की सम्मानसूचक विशेषताओं से वंचित होकर मैं उन देशवासियों के साथ जाकर खड़ा हो जाऊं, जो अपनी कथित तुच्छता के कारण ऐसे अपमानों के शिकार होते हैं जो मनुष्यों के लिए अनुचित है। यही वे कारण हैं जिनकी वजह से मैं इस बात के लिए मजबूर हुआ हूं कि उपयुक्त सम्मान के साथ महामहिम से यह निवेदन करूं कि आप मुझे नाइट की उपाधि से मुक्ति दें, जिसे मैंने तब आपके पूर्ववर्ती महान सम्राट के हाथों ग्रहण किया था, जिनके हृदय की महानता को मैं अब भी प्रशंसा के साथ देखता हूं।''

पंडित मदन मोहन मालवीय तथा मोती लाल नेहरू, स्वामी श्रद्धानंद और गांधी जी सहित सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। हजारों निर्दोष, निहत्थे लोगों को गोलियों से भून डाला गया। इस नरसंहार ने देश को हिलाकर रख दिया। जलियांवाला बाग में बेशक हजारों की संख्या में लोगों ने देश की खातिर अपनी जान गंवाई लेकिन देश के लाखों-करोड़ों लोगों के दिलों में देश प्रति जो प्रेम की ज्वाला जलाई उसी का परिणाम है कि देश 15 अगस्त, 1947 को आजाद हो गया।

जलियांवाला बाग में हुए शहीदों की शहादत के 100वें वर्ष पर उनको सलाम। इन शहीदों के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम सब संकल्प लें कि ''जीयेंगे तो भारत के लिए मरेंगे तो भारत के लिए।''
जय हिन्द 

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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